Devi Prasad

Devi Prasad
University of Hyderabad | UoH · Department of Sociology

Doctor of Philosophy
Writer, researcher (Sociologist), columnist, author. Recipient of MN Srinivas Award & Institute of Eminence Award 2021.

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Citations
Introduction
My research covers caste, rural sociology, Indian social reformers, new social movements, Dalits, Hindu's rituals, etc.I have published a few articles (4dozen)@UGC_CARE (Scopus) journals, viz.,Routledge, sage, Eastern Anthropologist, South Asian Anthropologist, Man in India, Social Change, South India Journal of Social Science, Contemporary voice of dalit & Hindi journals like samajik vimarsh, bhartiye samajik samiksha, mook & hasiye ki awaj, and ThePrint, ForwardPress, Round Table India, etc.
Additional affiliations
July 2014 - April 2022
University of Hyderabad
Position
  • Senior Researcher
Description
  • Working as a research scholar.
Education
July 2018 - June 2021
July 2016 - June 2017
University of Hyderabad
Field of study
  • Human Rights
July 2011 - December 2013
Pondicherry University
Field of study
  • Inter-caste and intra-caste relations among Yadav community

Publications

Publications (68)
Article
Full-text available
शोध अंक 57, जनवरी-मार्च 2022 (शोध दिशा: विश्वस्तरीय शोध पत्रिका) यह लेख फूलन देवी के सामाजिक संघर्षों पर आधारित है. स्त्री विमर्श के संदर्भ में लिखा गया यह आलेख समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के साथ लिखा गया है.
Article
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उत्तर प्रदेश में आधी से ज्यादा सीटों पर पांच चरणों में मतदान की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है. इन चरणों में आम जनता ने खुलकर मंहगी बिजली, खाद्य, बीज के साथ साथ बढ़ी हुई बेरोजगारी तथा राजनीतिक भागीदारी पर खुलकर अपनी बात रखी. हालांकि, गरीब, दलित व वंचित तबके की स्थानीय मुद्दों को दरकिनार करके मेनस्ट्रीम मीडिया अखिलेश बनाम योगी के नाम का जाप करती दिखाई...
Article
भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल 1980 में हुई थी. यह वही दौर था, जब मंडल कमीशन ने 27 प्रतिशत आरक्षण पिछड़े वर्ग यानि देश की लगभग आधी आबादी को सामाजिक न्याय देने का सुझाव दिया था. हालांकि, साफ्ट हिंदुत्वा की राह पर चलने वाली कांग्रेस ने कमंडल के डर से एक दशक तक मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का राजनीतिक जोखिम नही उठाई. जिसके कारण पिछड़ा वर्ग कांग्रेस स...
Article
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बीबीसी हिंदी में छपी सीएसडीएस की एक रिपोर्ट के मुताबिक (विधानसभा-2017 में) जाट बिरादरी का 2 प्रतिशत वोट कांग्रेस, 39 प्रतिशत बीजेपी, 3 प्रतिशत बसपा तथा 11 प्रतिशत समाजवादी पार्टी को गया था. वहीं कोइरी+कुर्मी बिरादरी का 57 प्रतिशत वोट बीजेपी, 14 प्रतिशत बसपा तथा 18 प्रतिशत सपा को गया था. जाटव बिरादरी का दो तिहाई वोट बसपा को जबकि गैर-जाटव का 31 प्रति...
Article
The main objective of the present paper is to explore the relevance of Ambedkarism (thoughts of Ambedkar) and how it brings political consciousness among backward sections. B.R. Ambedkar advocates the path for emancipation through his personal experiences and he gave three mantras: 'educate', 'agitate' and 'organize'. The idea of 'education' would...
Article
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अखिलेश यादव इस बार सत्ता से लड़ने के साथ ही #गोदीमीडिया पर भी प्रश्नवाचक चिह्न लगाते नजर आ रहे हैं। क्योंकि इस बार मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा यूपी में विधानसभा चुनाव को सपा बनाम भाजपा ध्रुवीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है। जहां एक तरफ़, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस समय हिन्दू-तुष्टीकरण, दलित, पिछड़ा, किसान, मुसलमान तथा जिन्ना जैसे शब्दों का प्रचलन अ...
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अन्य दलों के दबाव के कारण मुलायम सिंह यादव सामाजिक न्याय के अति-महत्वपूर्ण मुद्दे पर खुलकर बोल नही पा रहे थे। इसलिए मुलायम सिंह यादव कुछ अन्य महत्वपूर्ण समाजवादी विचारकों के साथ 1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना की तथा सामाजिक न्याय के मुद्दे को उत्तर प्रदेश में एक नई सियासी धार दी। जिसके फलस्वरूप वर्ष 1993 में उन्हें दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने क...
Research
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उत्तर प्रदेश (यूपी) में चार बार मुख्यमंत्री के पद पर एक कुशल प्रशासक के रूप में तथा साथ ही सामाजिक न्याय के मुद्दे पर भी उनकी एक अलग पहचान है. आज दलित-शोषित समाज की नजर बसपा की सियासी रणनीतियों व कार्यप्रणालियों पर लगी है और प्रदेश की सबसे ऊंची कुर्सी पर उन्हें बैठे देखना चाहता है.
Article
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अब ‘नई सपा है, नई हवा है’ की चुनावी टैगलाईन के साथ अखिलेश यादव बराबर राजनीतिक साझेदारी और समान भागीदारी के संकल्प के साथ ओमप्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान जैसे अनेक कद्दावर नेताओं के साथ मिलकर यूपी में चुनावी चक्रव्यूह को भेदना चाहते हैं.
Article
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https://gaonkelog.com/a-new-leadership-emerging-among-the-dalit-backward-classes-in-the-villages-of-eastern-uttar-pradesh/ 1990 के दशक में सत्ता का विकेंद्रीकरण किया गया। तब से हाशियाकृत दलित-पिछड़ा समाज भी लोकतंत्र के महापर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना शुरू किया। स्थानीय स्तर पर उच्च जातियों के सामाजिक-राजनीतिक प्रभुत्व को भी चुनौती मिलनी शुरू हु...
Article
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अक्सर कहा जाता है कि दिल्ली का राजनीतिक गलियारा उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है और यूपी का जनादेश देश की सियासत की दिशा और दशा तय करती है. अगर ये बात विधानसभा चुनाव के सन्दर्भ में हो तो राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें यूपी की प्रमुख सियासी मसलों पर टिकना स्वाभाविक है. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के कार्यकाल को ‘27 साल यूपी बेहाल’...
Article
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The paper has tried to understand the ground reality and the recent pattern of social activism, which are influenced by social media and digital technologies. It appears that social media and online digital platforms as well as the print media have become an effective tool in the recent past for indulgent communication during anti-CAA protests. The...
Raw Data
https://herald.uohyd.ac.in/devi-prasad-wins-m-n-srinivas-award/ Devi Prasad wins M. N Srinivas award Mr. Devi Prasad, Doctoral Fellow at the Department of Sociology, University of Hyderabad has won the Indian Sociological Society’s M. N Srinivas award for his paper titled “Caste Identity and Community Feast among Yadavs: An interpretation”. This pa...
Article
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उम्मीदों के ‘विजय रथ’ पर सवार अखिलेश यादव चल पड़े हैं. यह बिना सोचे कि क्या होगा अगर मंजिल कदम चूमने से इनकार कर देगी लेकिन यह तो तय है कि वे एक बेहतरीन सफ़र की यादें जरूर साथ लेकर जायेंगे. कभी ‘एमवाई’ (मुस्लिम + यादव) सूत्र पर चलने वाली समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव आज भाजपा की तीव्र आक्रामकता के कारण अल्पसंख्यक मुसलमानों के हित...
Article
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Akhilesh Yadav is promising to hold a caste census in UP. It’s an issue that BJP and Congress have remained silent on out of fear they will lose dominant caste votes. Riding a chariot laden with hopes of victory, Uttar Pradesh’s former chief minister and Samajwadi Party president Akhilesh Yadav has begun his campaign for the 2022 assembly election...
Article
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https://hindi.theprint.in/opinion/bahujan-women-have-some-deadly-questions-from-congress-what-percentage-of-seats-will-be-reserved/256412/ महिला आरक्षण बिल, जातीय जनगणना, राजनीति में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व, न्यायिक तथा सरकारी पदों में समान प्रतिनिधित्व जैसे गंभीर विषय पर कांग्रेस व अन्य पार्टियां क्यों चुप्पी साधती रही हैं ? क्या इसका सीधा...
Article
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Based on a field study of Tandawa village located in east Uttar Pradesh, the article examines the pattern of caste cohesion in a rural society and studies how divisions and hierarchy still surface and remain a reality. This ethnographic study shows that though many socio-cultural traditions are practiced in northern India, some are undergoing subtl...
Article
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यह पुस्तक भारतीय सामाजिक संरचना में व्याप्त प्रदत्त ब्राह्मणवादी वर्चस्व और आधिपत्य को समझने का एक नया नजरिया भी प्रदान करती है. महात्मा फुले ने तार्किक दृष्टिकोण के साथ भारतीय समाज में जातीय भेदभाव के सैधांतिक पक्ष पर अपनी लेखनी चलाई, जिसे हर समानता पसंद व्यक्ति को पढना चाहिए । गुलामगीरी पुस्तक के माध्यम से महात्मा ज्योतिराव फुले यह संदेश देना चाह...
Article
Journal name: "Indian Anthropologist" publish by "Indian Anthropological Association" The Lanjia Saura (alternative names include Sora, Saura, Savara, Sabara, etc) is a Munda ethnic group from eastern India. They are one of the particularly vulnerable tribal groups (PVTGs) and live in the remote areas of the southern region of Odisha (eastern ghat...
Article
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ओडिशा के रायगडा जिले के पुट्टासिंग पंचायत में निवास करने वाली लांजिया सौरा प्राचीन भारतीय जनजातियों में से एक है । इशाई मिशनरियों का हस्ताक्षेप अधिक होने के कारण सौरा जनजाति में धार्मिक रूपांतरण तेजी से हो रहा है । आज यह जनजाति अपनी पुरानी सांस्कृतिक धरोहर तथा परंपरागत मूल्यों को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही है । प्रस्तुत आलेख में धार्मिक रूपांतरण...
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प्रस्तुत लेख का मुख्य उद्देश्य भारत में फैली कोरोना महामारी से त्रस्त बहुजन समाज की समस्याओं को समझने के साथ-साथ केंद्र सरकार की अदूरदर्शी नीति तथा भारतीय स्वास्थ्य तंत्र के फेल होने से उत्पन्न सामाजिक अव्यवस्थाओं को तार्किक ढंग से विश्लेषण करना है । यह लेख मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन के इस दौर में सोशल मीडिया के प्रभाव को वंचित समाज के संदर्भ में भ...
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https://www.forwardpress.in/2021/06/analysis-up-election-kanshi-ram-vision-hindi/ Forward press on 18 June, 2021 कांशीराम का कहना था कि पदलोलुप्ता के चक्कर में बहुजन समाज के नेता बड़े दलों के चमचा मात्र बनकर रह जाते हैं तथा अपने राजनीतिक हितों को सर्वोपरि रखते हैं। ऐसे लोग अपने समाज के हितों के साथ समझौता करने से भी नहीं चूकते हैं। पढ़ें, देवी प्र...
Article
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Published by "South India Journal of Social Sciences" The present study attempts to understand the consequences of natural disasters and how the NGOs co-opt to deal with such an issue in particular reference to cyclone Fani. In addition, the paper looks at how vitally essential it is for a Non-Governmental Organization (NGO) to collaboratively par...
Article
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बहुजन समाज के बौद्धिक वर्ग द्वारा शोसल मीडिया पर अक्सर एक महत्वपूर्ण बात साझा की जाती है कि ‘समाज के लिए लड़ो, लड़ नहीं सकते हो तो लिखो, लिख नहीं सकते तो बोलो, बोल नहीं सकते तो साथ दो, तथा यदि साथ भी नहीं दे सकते तो जो लिख, बोल और लड़ रहे हैं, उनका सहयोग करें । यदि आप सहयोग देने में भी असमर्थ हो तो कम से कम उनका मनोबल न गिराये, क्योंकि वो आपके हिस्...
Article
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प्रस्तुत लेख में निर्देशक संजीव जायसवाल के निर्देशन में बनी फिल्म 'शूद्र द राइजिंग' के माध्यम से दलित विमर्श के कुछ अनकहे दास्तान का तार्किक विश्लेषण किया गया है। व्यावहारिक धरातल पर भारतीय वर्णवादी व्यवस्था में दलित समाज को ‘अति-शूद्र’ का दर्जा दिया गया था। दलित समाज के ऊपर अतीत में घटित क्रूरता की दास्तान (अट्रोसिटी अगेंस्ट दलित) को यह फ़िल्म बखू...
Data
“पृथ्वी सभी मनुष्यों की ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराती है। लालच पूरा करने के लिए नहीं।” - महात्मा गांधी महात्मा गांधी ने एक ऐसी आधुनिक या बुनियादी आवश्यकताओं की परिकल्पना की जो आधुनिक सभ्यता के विपरीत भौतिक कल्याण और लाभ के उद्देश्य को बढ़ावा देने वाली जरूरतों की सीमा पर केंद्रित हो। वे कहते थे कि ‘शारीरिक सद्भाव और आराम की ए...
Article
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Vol. 16 (03) year 2021 मुसहर समाज की सामाजिक-आर्थिक स्थिति: मुसहर महिलाएं देवी प्रसाद (dpsocio@gmail.com) एवं राम अवतार यादव (ramawtar86@gmail.com) Abstract मुसहर समाज में महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति बहुत कमजोर होने के कारण, उनकी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक भागीदारी भी नगण्य रही है, जिसके फ़लस्वरूप वे अपनी भूख मिटाने के लिए चूहा, घोंघा, सुअर, बाजर...
Article
सार प्रस्तुत शोध पत्र का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण जीवन की दोनों लोक-विधाओं (फरुवाही और बिरहा) के विभिन्न पक्षों को गहराई से समझना है । अहीर, पासी, गड़ेरिया, धोबी तथा अन्य श्रमजीवी जातियों में ख़ासकर प्रचलित इन विधाओं को गायक अपने अन्य पांच या छह साथियों (गायक-मंडली) के साथ कुछ वाद्य-यंत्रों- ढोलक, हारमोनियम, घुंघरू और करताल आदि की सहायता से प्रस्तु...
Article
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पूर्वी उत्तर प्रदेश बना राजनीतिक चारागाह, दलित-बहुजनों में भी उहापोह की स्थिति इतिहास के स्याह पन्नों में झांकने से हमें भान होता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश वही क्षेत्र है, जहां 1990 के दशक में मंडल को कमंडल से दबाने की भरपूर कोशिश की गई, लेकिन मुलायम सिंह यादव, कांशीराम जैसे नेताओं ने सामाजिक न्याय की लौ को बुझने नही दिया। इसके इतर आगामी विधानसभा...
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भूमिका आज ज्योतिराव गोविंदरावफुले, संत कबीर और गाँधी के दर्शन ‘सहिष्णुता एवं प्रतिरोध’ पर चर्चा करना और भी जरुरी हो जाता है, जब देश की सत्ताधारी पार्टी की सांसद प्रज्ञा ठाकुर कहती हैं- "नाथूराम गोडसे एक देशभक्त था, एक 'देशभक्त' है और एक 'देशभक्त' बना रहेगा। उसे आतंकवादी कहने के बजाय लोगों को उसके अंदर घुसना चाहिए, ऐसे लोगों को चुनाव में उचित जवाब...
Article
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समाज के हाशिये या दमित वर्ग की सामाजिक समस्याओं को तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा हमेशा अनसुना या महत्वहीन करार दिया गया। शायद इस बात से अम्बेडकर भलीभांति चिरपरिचित थे। इसलिए बहुजन समाज की समस्याओं को सामाजिक पटल पर उठाने के लिए उन्होंने ‘मूक नायक’ (31 जनवरी, 1920) नामक अख़बार का भी संपादन किया, तथा हाशियाकृत समाज में उठ रहे प्रतिरोध के स्वरों तथा उन...
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“पृथ्वी सभी मनुष्यों की ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराती है। लालच पूरा करने के लिए नहीं।” - महात्मा गांधी महात्मा गांधी ने एक ऐसी आधुनिक या बुनियादी आवश्यकताओं की परिकल्पना की जो आधुनिक सभ्यता के विपरीत भौतिक कल्याण और लाभ के उद्देश्य को बढ़ावा देने वाली जरूरतों की सीमा पर केंद्रित हो। वे कहते थे कि ‘शारीरिक सद्भाव और आराम की...
Article
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Abstract The main aims of the present study are to understand the challenges and opportunities of pedagogy in Indian social system because ensuring access to education for the Dalitsi of India has been the greatest challenge to the Indian government. The present article also explores the tradition of the socio-economic oppression of the Dalit commu...
Article
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सार (Abstract) प्रस्तुत लेख का प्रमुख उद्देश्य शिक्षा के महत्व को अम्बेडकरवादी अवधारणा के माध्यम से तर्कपूर्ण विश्लेषण करना है, क्योंकि शिक्षा ही वह कुंजी है जो व्यक्ति को सम्पूर्ण मानव बनाती है। जहाँ एक तरफ़, ज्योतिबा फुले शिक्षा के सामाजिक महत्व को समझाते हुए लिखते हैं कि- “विद्या बिन मति गई, मति बिन निति गई, निति बिन गति गई। गति बिन धन गया, धन ब...
Article
Dalits constitute around a sixth of India’s population. They have been safeguarded by the ‘Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989’, but the adequate implementation of this special Act is in question because many instances of atrocities have been occurring consecutively. As such, this article attempts to understan...
Article
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Socialization is a process of growth and adaptation where human in the form of biological being is born as an infant child into a group and during his oncoming growth and aging is transforming into an adult and towards the old age acquires learning that is necessary not only to interact, coexist and participate with other fellow and living species,...
Article
Volume 2, Issue 2, December 2019 सार (Abstract) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को पुरुषार्थ माना जाता है, जिसे हिंदू समाज पूर्ण करने की अभिलाषा रखता है। हिंदू धर्म के सिद्धांतों के अनुसार, मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। हालाँकि, पुण्य और पुरुषार्थ का मार्ग कर्मकाण्डों (पिण्डदान और श...
Article
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मुझे अभी भी याद है बचपन का वो दिन जब ग्रामीण दलित-बहुजन महिलाएं स्थानीय भाषाओं में लोकगीत गाते हुए वोट डालने जाती थी, और गाने का मुखड़ा होता था- “चला सखी वोट दय आयी, मुहर ‘पंजा’ पर लगाई.” दलित-बहुजन समाज पर अनेक लेख पढ़ने-लिखने के पश्चात मेरा ध्यान उन गाती हुयी ‘मतदाताओं’ और उस समाज के राजनीतिक अधिकारों तथा प्रतिनिधित्व पर गया और ज्ञात हुआ कि कांग्...
Article
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STRAP: Despite constituting more than half of India’s population, OBCs have been more or less absent from the top echelons of the Indian National Congress. The party needs to realize soon that it cannot claim to be inclusive without making OBCs real stakeholders.
Article
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डेंगू, मलेरिया, चिकन-पॉक्स, हैजा, पीलिया, निमोनिया जैसी बीमारियाँ समय-समय पर गाँवों में अपना पैर पसारती रही हैं। जहाँ एक तरफ, चिकन-पॉक्स को धार्मिक चोला पहनाया गया और उसे ‘मिनी-माता’ नाम देकर पूजा-अर्चना के माध्यम से निजाद पाने की कोशिस की गई। वहीं दूसरी ओर, हिस्टीरिया जैसी मनोवैज्ञानिक बीमारियों को ‘भूतनी आने’ की समस्या से जोड़ दिया गया। जिसका प्र...
Article
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The term ‘dhobi-ghat’ refers it to be the world’s largest outdoor laundry, which is traditionally associated with Chakali (washermen) community. Dhobi or Chakali caste is at the lowest position in Hindu social order. They are performers of the most crucial task (cleanliness), and still, today trapped in the throes of poverty, illiteracy, social dis...
Article
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The step by the central government of India of striping a currency unit, the 500- and 1000- rupee notes, of its status as legal tender on 8 November 2016 became a prime debate in electronic as well as printed media for several days. Various newspapers also reported how the decision of ‘demonetization’ had effected mostly to unorganized rural retail...
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Dalitbahujan response acts "as a moral counterweight to the language of politics" 1. Critique of theoretical approach to racism 2. Critique of Marxism 3. Critique of Hindutva 4. Critique of the 'universal' in academia 5. Critique of identity politics, human rights paradigm and neoliberal nationalism 6. Dalit feminist critique 7. Pasmanda-Muslim cri...
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Curriculum vitae
Chapter
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Post-Ambedkarite movements have given a new legacy to Dalit-Bahujan politics, and Uttar Pradesh (UP) had witnessed a political shift that emerged during the 1990s. On the one hand, a socialist leader, Mulayam Singh Yadav along with few other leaders formed the Samajwadi Party (1992) in U.P. with the principle of ‘equality’ or ideology of ‘socialist...
Chapter
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my new article "CASTE IDENTITY AND COMMUNITY FEAST AMONG YADAVS" in an edited book "Caste and Gender in Contemporary India: Power, Privilege and Politics" (published by Routledge India; 1 edition, 18 October 2018) has been published. This book explores the intersectional aspects of caste and gender in India that contribute to the multiple marginal...
Research
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The broader objective of this paper is to map out significant political consequences from the colonial period to post-independence as well as to retrace about major academic debates on the multiple dimensions of caste in rural society. The paper also deals with a few new insights. Few examples have been drawn from Tandawa village of Sultanpur distr...
Article
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The broader objective of this paper is to map out significant political consequences from the colonial period to post-independence as well as to retrace about major academic debates on the multiple dimensions of caste in rural society. The paper also deals with a few new insights. Few examples have been drawn from Tandawa village of Sultanpur distr...
Article
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Mahatma Jyotirao Phule's book ‗Gulamgiri' (Slavery) is considered one of the Pioneer books. It explores Brahminical supremacy and hegemonies in the social structure of Indian society. It critiques the institution of caste through a 16-part essay and four poetic compositions, and it is written in the form of a dialogue between Jotiba, and a characte...
Research
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I am currently interested to work on Hindu's rituals, customs, and cultural identity. My research also covers gender, caste politics, rural problems, human rights, etc.
Article
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भारतीय जनगणना वर्ष (2011) के अनुसार, 17.91 करोड़ परिवार भारत के ग्रामीण अंचल में निवास करते हैं , जिसमे से लगभग आधी आबादी महिलाओं की है, जो कि अधिकांशतः (लगभग 84 प्रतिशत) लघु उद्योगों, कृषि व इससे संबंधित व्यवसायों में कार्यशील है। इन कार्यशील महिलाओं में 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 16 प्रतिशत जनजाति, तथा 43 प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्गों से हैं (कांची,...
Article
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भूमिका ग्रामीण भारत बहु-सांस्कृतिक, क्षेत्रीय भाषाओँ से ओतप्रोत एक साझा अभिव्यंजक सांस्कृतिक विरासत होने का श्रेय प्राप्त करता है। यह विरासत स्थानीय रीति-रिवाज, विश्वास, नवाचार, कर्मकांड, रूढ़ि, नैतिकता, आदि से गुम्फित होती है। ग्रामीण जनमानस में बिरहा, आल्हा, नौटंकी, सोहर, नकटा, विदेशिया, गोदना, मल्हार, आदि सम्प्रेषण के अनेक स्थानीय मौखिक माध्यम...
Article
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‘जय जवान जय किसान’, ‘भारत की आत्मा गाँवों में निवास करती है’, ‘मै किसान का बेटा हूँ’, आदि राजनीतिक कहावतें भारतीय जनमानस के मस्तिष्क पटल पर गहराई से छाप छोड़ती हैं। हालाँकि कृषक समाज इन राजनीतिक स्लोगनों से बहुत सरोकार नहीं रखता है। अन्नदाता वर्ग अपनी मेहनत से एक उत्पादक व उद्यमी के रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में हमेशा मेरुदंड साबित...
Article
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ग्राम्य अंचल लोकगीतों के लिए अपनी एक पृथक पहचान रखता है। लोकगीत जनमानस के गीत हैं, जो कि ग्रामीण परिवेश की जीवन शैली का एक अविभाजित/अपरिहार्य अंग होने के साथ ही जीने के तरीके को दर्शाता है। ग्रामीण परम्पराओं के साथ पूर्णतया जुड़े होने के कारण लोकगीतों को परिवर्तन का अनुगामी नहीं माना जाता है और इसे मौखिक रूप से, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को, हस्तांतर...
Article
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The Indian Prime Minister, Narendra Modi, said, [P]ehle shauchalaya, phir devalaya (Build toilet first and temples later). On the day of ‘Gandhi Jayanti’ (2 October) in 2014, ‘Swachh Bharat Abhiyan’ was launched officially. In this regard, this article attempts to understand the idea of ‘Nirmal Gram Puraskar’ (NGP) through a comparative analysis of...
Article
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The present study attempts to articulate the relation between social reciprocity and ‘village exogamy’ in two villages namely Rajanpur and Tandwa of eastern Uttar Pradesh. The idea of village exogamy incorporates a social arrangement with local setting in which making marital relation is prohibited for the people. This social arrangement develops a...
Article
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Caste system is a very complex phenomenon for women by which they are being segregated and kept away from social occasion. The segregation indicates towards kinds of male-hierarchies that are exercised through deliberative social occasion like chittha system (male-based managerial system) of biradari bhoj (socio-ritual based community feast) in rur...
Article
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Vol. 6 (6), 2016 Social Movements are an inevitable part of societies because they become a means of socio-cultural changes through collective mobilization. The idea of ‘social mobilization’ depends on degree of unrest, social distance, monopoly over resources, ideology, and existing authority. These factors create a relative deprivation that is be...
Data
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Article
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The propensity of looking into genealogy, caste-atrocities, social boycott, and the ambition of upward (caste) mobility are consecutive features of rural societies across the country. On the one hand, the rural society has been represented in long time by deep-rooted casteism that creates kind of blind perception or faith towards his own caste and...
Data
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Article
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Sanskara (ordination) and Rina (debts) system are inevitable part of the Indian culture. In Hindu Dharma’s mythology, there are four types of Rina system; a man is born with a debt which must be paid off before one’s death; namely, Dev Rina, Rishi Rina, Pitra Rina and Atithi Rina. Within the Pitra Rina, there are four steps; they are Antyeshti Sans...
Book
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The propensity into religious activities and caste orientations are common feature of Indian society, and often it imposes substantial costs upon its practitioners. Especially in rural scenario has been found where deep rooted spirit of casteism among villagers creates a kind of tension and irrational practices (like- Biradari Bhoj). In addition, t...

Questions

Questions (9)
Question
Dear All,
I have noticed that there are a few companies, which are selling awards for research scholars and professors. For example, I often receive such emails (mentioned below) from different companies. What is your opinion on this?
"Dear Sir/Madam ... No fee for submitting your nomination. If selected by our review committee then you will be considered as a Premium Member of InSc with many technical benefits to which you have to register by paying a package amount of Rs.5000/- which includes 18% GST & postal charges within India. For foreign countries, registration fee is 100USD which also includes postal charges. Benefits are mentioned below: 1.Hard copy of the certificate with respective Award Title and Brass plated Memento will be given where awardee name and work details will be mentioned. 2. Life time valid  InSc Professional Membership which is worth of Rs.1500/- will be given. Id card and certificate will be issued for the same.For more details and benefits visit www.insc.in/membership 3.He/She will be considered as reviewer for our InSc Journals and certificate will be issued for the same. For more details on InSc Journals log on to www.insc.in/journals 4. Registered participants details along with photo will be published in the InSc Year book which will be circulated among more than 15,000 subscribers and soft copy of the year book will be given. 5.His/Her details will be displayed in our awards department page www.insc.in/awards which has page views in thousands. 6. He/She may be invited as a session chair / resource person for InSc events in his/her area of expertise 7. Support  for Book Publication with ISBN. For more details visit www.insc.in/iph 8. Support for publication in Scopus, UGC, SCI listed Journals 9. Free plagiarism checking service. 10. Platform to interact with research experts at INSC Conferences www.insc.in/conferences 11. 10% Reduction in fee of INSC events like International conferences, Seminars and workshops. 12. InSc Professional Member will get free access to all the InSc papers available in InSc Digital Library of Research Papers (DLRP) www.insc.in/dlrp 13. There will be a region wise Coordinator and Chief Coordinator for InSc members based on their involvement and support to INSC technical operations. 14.  Adds points to your API score as per NAAC and UGC API Score criterias. For more details visit www.insc.in/awards"
Thanks in advance.
Regards,
Devi Prasad
Question
Though creating new knowledge or exploring the hidden realities is part of the PhD training, but the main objective of doing PhD degree is to become a competent researcher who can conduct independent research in his or her chosen area...
What do you think?
Question
CALL FOR ARTICLES
“THE PILLERS OF BAHUJAN LIBERATION”
Dear All,
We are pleased to invite articles for a book (with ISBN) on ‘the great Bahujan personalities.’ This collection intends to shed light on well-known as well as the forgotten heroes, and it would serve as a compendium for the current and future generations. The tentative title of this book is “THE PILLERS OF BAHUJAN LIBERATION.” You are requested to send a brief article (around 1800 words) on following sub-themes-
· Historical Figures
As postulated by Christophe Jaffrelot, the silent revolution of Bahujan began in the 1990s. However, if we look back, there is a historical trail, right from the revolutionary thoughts of Buddha against Brahminical hegemony. The saints, poets, social reformers of medieval India posed a significant challenge to the Brahminism again. If we investigate further, there are a plethora of such unknown figures. The works of Kabir Das, Rabi Das, Guru Ghasi Das, etc. can be explored and rewritten in the Bahujan perspective.
· Liberators from the modern Era
After the arrival of the British in India, the Brahminical system encountered a considerable setback. The European concept of liberty, equality, fraternity permeated into our society through different avenues. In this section, we would like to explore the Bahujan liberators of this era, such as Jyotiba Phule, Periyar, Narayan Guru, and other unknown figures.
· Heroes of Our Time
After Independence (1947), there was new hope of ray among the Bahujans. Many socio-political changes took place time-to-time. As a result, the leaders of the marginal section asserted for their rights and political representation and pushed the struggle for liberation further. The towering crusader for the oppressed Ambedkar paved the way for a wide range of leaders from the Bahujan section, such as Karpuri Thakur, Jagdeo Prasad, Kanshiram, Mayawati, Mulayam Singh, Lalu Prasad Yadav, and many others. Parallel to the political assertion, there were social revolutionaries such as Ramswarup Varma, Lalai Singh Yadav, and the like. However, the list is vast, and we would like to invite the researchers to bring to the light less-known or the forgotten heroes who helped in the Bahujan liberation in the country.
Please send your articles (Hindi or English) to the following email address:
Question
I want to learn...possibilities and opportunities in Indian context of above area.
Question
Why washermen come under the constitutional classification of Most Backward Classes (MBCs) in South India while in north India, they are classified constitutionally as Schedule Caste?
Question
The title of my PhD thesis is "Caste, Ritual, and Politics among Yadav Community of Eastern Uttar Pradesh".
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The present study attempts to understand the social process of rituals as well as to examine the impact of the ritual for socio-political mobilization with particular reference to Yadav community of Eastern Uttar Pradesh. In addition, the research explores the process of articulation of the commensal practices called biradari bhoj by which different sub-castes of Yadav community seem to build a collective identity. The ‘collective identity’ denotes here the ‘fusion’ of different ‘cognate castes’ (Ahir, Goal, Gop, Dhandor, etc.) of Yadavs, who fall under the political classification of ‘Other Backward Classes’ (OBCs). Particularly, the present work deals with the cultural aspect of participation of Yadav community in the context of Uttar Pradesh.
Question
THINKING AGAINST CASTE HIERARCHIES
If we look at the real scenarios of downtrodden section, it can find that the path
of democratic right of this society is not as smooth or usual as other, because caste basis socialsetups like Khap Panchayat1 and Chittha System are phenomena against from equalitarian notion of justice and equality. After Mandel Commission, that is why, identity-politics of caste have been emerged as new discourse in Indian socio-political as well in academic sphere. The result of which many pro-caste basis socio-political organizations like All India Yadav Maha-Sabha [AIYMS], All India Kurmi-Kshatriya Mahasabha [AIKKM], Kshatriya Mahasabha, Brahmins and Dalit organization etc. have been occurred.
Question
I want to know the deference between peer reviewed journals and referred journals.

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